तुलसी सेवा और दीपदान का विशेष महत्व : आचार्य दीपू महाराज
जागरण टाइम्स डेस्क, 24अक्टूबर।अमृत वर्षा के पर्व शरद पूर्णिमा का व्रत आज 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा, जबकि स्नान-दान की पूर्णिमा 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इसी दिन से कार्तिक मास के स्नान, दान, दीपदान और यम-नियम का आरंभ होगा। महर्षि वाल्मीकि जयंती भी 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी। भगवान विष्णु को प्रिय कार्तिक मास में 27 अक्टूबर से 24 नवंबर तक दीपदान और अन्य पुण्य कर्म किए जाएंगे।

पंडित दीपू महाराज ने काशी पंचांग, ऋषिकेश के अनुसार बताया कि पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 10:40 बजे से प्रारंभ होकर 26 अक्टूबर को सुबह 9:40 बजे तक रहेगी। शरद पूर्णिमा का मुख्य कर्मकाल रात्रि में होने के कारण इसका पर्व 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा।उन्होंने बताया कि शरद पूर्णिमा पर शुद्ध गाय के दूध और शक्कर से बनी खीर को खुले आकाश के नीचे चंद्रमा की चांदनी में रखने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि पूर्णिमा की अमृतमयी चांदनी में रखी खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्यता, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसी मान्यता के कारण शरद पूर्णिमा को अमृत वर्षा का महापर्व भी कहा जाता है।
कार्तिक मास के पांच प्रमुख नियम
पंडित दीपू महाराज के अनुसार, कार्तिक मास में पांच प्रमुख नियमों का पालन विशेष फलदायी माना गया है। इनमें भगवान विष्णु की आराधना, रात्रि में जागरण, भजन-कीर्तन, प्रातःकाल स्नान तथा तुलसी सेवा और दीपदान जैसे धार्मिक कर्मों का विशेष महत्व है। इस दौरान व्रत, उद्यापन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी श्रद्धापूर्वक किए जाते हैं।
तीन दिन स्नान करने से भी मिलता है पुण्य लाभ
पंडित दीपू महाराज ने बताया कि यदि शारीरिक असमर्थता, अधिक आयु अथवा अन्य परिस्थितियों के कारण पूरे कार्तिक मास तक स्नान-दान के नियमों का पालन करना संभव न हो, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक मास में तीन दिन स्नान करके भी पुण्य लाभ अर्जित किया जा सकता है। कार्तिक मास में श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। इस पवित्र महीने में तुलसी सेवा, दीपदान, भगवान विष्णु की आराधना और दान-पुण्य करने से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

केपी नारायण स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय।



