एमएलसी चुनाव के नतीजे के बाद उठ रहे कई सवाल
जागरण टाइम्स, लखनऊ 31 अक्टूबर। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनाव के नतीजे ने सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी के टॉप लीडर्स को परेशान कर दिया है। परेशान इस बात को लेकर रहेगी जल्द ही यहां पर विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। वर्तमान में जिस तरह की चुनौतियां राजनीतिक परिदृश्य बनी हुई है, उसके सापेक्ष यह कहा जा रहा है कि क्या उत्तर प्रदेश में भाजपा को ही बने रहने देने के लिए योगी आदित्यनाथ को फ्री हैंड किया जाएगा। या फिर दूसरे लोग इस राज्य के लिए टिकट तय करेंगे और बाद में तमाशा देखेंगे।

इस प्रकार के सवाल अगर उठ रहे हैं तो उनके पीछे मजबूत आधार भी है। हाल में ही उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के चुनाव हुए और उनमें भाजपा का बेड़ा लगभग गर्क हो गया। जिस तरह के कयास लगाए जा रहे थे, वैसा कुछ हुआ नहीं। अब नतीजे के बाद विधानसभा चुनाव की तैयारी और प्रदर्शन पर बात जोर-शोर से हो रही है। इसमें सबसे बड़ा मसला संगठन का है। राजनीतिक क्षेत्र में कहा जा रहा है कि एमएलसी चुनाव में जो कुछ तस्वीर सामने आई उसके लिए बहुत बड़ी जिम्मेदार भूमिका संगठन की है। उत्तर प्रदेश के संगठन मंत्री को पहले भी नज़दीक से काम करते हुए देखा है, क्योंकि यूपी से पहले वे झारखंड के संगठन मंत्री थे।2014 में पहली बार झारखंड में पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार बनने के बाद वो आए। 2022 तक वे झारखंड में रहे, उसके बाद संगठन को इतना मजबूत किया कि 2019 में बीजेपी की करारी हार हुई और रघुवर दास की जगह हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने।
झारखंड भाजपा के संगठन में जातिवाद का बीज बोने का श्रेय इन्हीं के नाम है, पहले झारखंड में पार्टी के अंदर जाति के नाम पर इतनी चर्चा नहीं होती थी, जितनी आज है। लोकसभा में इनके आने से पहले 12 सीटें थी, जिसे बढ़ाकर इन्होंने 2019 के प्रचंड मोदी लहर में 11 कर दिया था।अगस्त 2022 में धर्मपाल सिंह को उत्तर प्रदेश भाजपा का संगठन मंत्री बनाया गया था। सितंबर 2026 में उनके सांगठनिक अनुभव पर दोबारा भरोसा जताते हुए उन्हें इसी पद पर बरकरार रखा है. धर्मपाल सिंह के कार्यकाल के दौरान 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन पहले के मुकाबले बहुत सुधार दिखा और पार्टी की सीटों की संख्या 62 से घटकर 33 पर आ गई।
सुनील बंसल के समय का जो ‘अजेय’ चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट और बूथ-स्तरीय नेटवर्क था, वह धर्मपाल सिंह के दौर में कमजोर नजर आया। विपक्ष (सपा-कांग्रेस गठबंधन) के ‘संविधान बचाओ’ और ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नैरेटिव का जमीन पर मुकाबला करने में संगठन का ढांचा असमर्थ रहा।धर्मपाल सिंह के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश भाजपा के भीतर ‘सरकार बनाम संगठन’ और ‘शीर्ष नेताओं के बीच शीतयुद्ध’ की खबरें सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहीं। संगठन मंत्री का मूल काम सरकार और संगठन के बीच सेतु बनना तथा आंतरिक गुटबाजी को शांत रखना होता है। यूपी बीजेपी में जिस प्रकार की बयानबाजी और नेताओं के बीच तल्खी दिखी, उससे यह धारणा बनी कि वे सांगठनिक अनुशासन और अंतर्विरोधों को थामने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए।
जमीनी कार्यकर्ताओं में यह असंतोष देखा गया कि अधिकारी वर्ग (नौकरशाही) उनकी सुन नहीं रहा है, और संगठन के पदाधिकारी शीर्ष नेतृत्व तक जमीनी हकीकत पहुंचाने के बजाय ‘सब ठीक है’ की कागजी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। पार्टी के आंतरिक फीडबैक में भी सामने आया कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के कारण वे चुनाव में पूरी ऊर्जा के साथ नहीं उतरे।उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल के वर्षों में विपक्ष ने हिंदुत्व के मुकाबले जातीय गोलबंदी (विशेषकर गैर-यादव ओबीसी और दलितों को साधने) को हवा दी है। धर्मपाल सिंह के नेतृत्व में संगठन सोशल इंजीनियरिंग के मोर्चे पर पिछड़ता दिखा। विपक्ष ने दलित और पिछड़े वर्ग के वोट बैंक में जो सेंधमारी की, उसे समय रहते भांपने और उसका सांगठनिक जवाब तैयार करने में उनकी रणनीति काफी धीमी रही।धर्मपाल सिंह से पहले सुनील बंसल लगभग 8 साल तक यूपी के संगठन मंत्री रहे, जिनके नाम 2017, 2019 और 2022 की बंपर चुनावी जीत दर्ज थीं। बीजेपी को यूपी जीतना है तो जाति छोड़ हिंदुत्व अपनाना होगा।

केपी नारायण स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय।







