
जागरण टाइम्स, चित्रकूट 31अक्टूबर।* सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के अवसर पर दीनदयाल शोध संस्थान, तुलसी कृषि विज्ञान केंद्र, गनीवा में कृषक प्रशिक्षण एवं उन्नत बीज वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में दीनदयाल शोध संस्थान के राष्ट्रीय संगठन सचिव अभय महाजन ने किसानों से आह्वान किया कि वे खेती में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के साथ-साथ मिट्टी के स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान दें। उन्होंने कहा कि मिट्टी केवल फसल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि कृषि की आधारशिला है। यदि मिट्टी का स्वास्थ्य सुरक्षित रहेगा, तभी खेती लंबे समय तक टिकाऊ और लाभकारी बनी रह सकती है।श्री महाजन ने कहा कि वर्तमान समय में कृषि के सामने मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, उत्पादन लागत में वृद्धि, जलवायु परिवर्तन तथा रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता जैसी अनेक चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों का स्थायी समाधान प्राकृतिक एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने में निहित है।

किसानों को अपनी खेती में स्थानीय संसाधनों, गोवंश आधारित जैविक आदानों तथा प्राकृतिक विधियों का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए। इससे खेती की लागत कम करने के साथ-साथ मिट्टी की जैविक सक्रियता एवं उर्वरता को बनाए रखने में सहायता मिलेगी।कार्यक्रम में भाजपा असंगठित मजदूरों के राष्ट्रीय नेता श्री आनंद साहू एवं दीनदयाल शोध संस्थान के वरिष्ठ कार्यकर्ता डॉ. अशोक पाण्डेय विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने किसानों से कृषि में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने तथा परंपरागत कृषि ज्ञान को आधुनिक कृषि विज्ञान के साथ जोड़कर आगे बढ़ने का आह्वान किया। किसानों को प्राकृतिक खेती की व्यावहारिक जानकारी दी गई।कार्यक्रम के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा कृषकों को प्राकृतिक खेती के विभिन्न पहलुओं पर विस्तारपूर्वक प्रशिक्षण प्रदान किया गया। किसानों को गेहूं, चना एवं सरसों की खेती प्राकृतिक विधि से करने के लिए प्रेरित किया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन प्रमुख रबी फसलों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल उन्नत एवं जलवायु प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना अत्यंत आवश्यक है। उचित किस्म का चयन करने से प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों में भी फसल की उत्पादकता एवं स्थिरता बनाए रखने में सहायता मिलती है।प्रशिक्षण के दौरान किसानों को बीज उपचार की प्राकृतिक विधि के अंतर्गत बीजामृत बनाने की विधि, उसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री तथा बीजामृत से बीजों के उपचार की प्रक्रिया की विस्तार से जानकारी दी गई। किसानों को बताया गया कि प्राकृतिक खेती में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से तैयार किए गए इन आदानों का समुचित उपयोग करके फसलों में कीट प्रबंधन किया जा सकता है। इसके लिए खेतों का नियमित निरीक्षण, कीटों की पहचान तथा समय पर उचित प्रबंधन करना आवश्यक है।*किसानों को वितरित किए गए गेहूं, चना एवं सरसों के उन्नत बीज* कार्यक्रम के दौरान किसानों को रबी मौसम की तैयारियों के दृष्टिगत गेहूं, चना एवं सरसों की उन्नत किस्मों के बीज भी उपलब्ध कराए गए। प्रसार वैज्ञानिक डॉ उत्तम कुमार त्रिपाठी ने किसानों को रबी फसलों की समयानुकूल बुवाई, बीज की उचित मात्रा, बीजोपचार, संतुलित पोषण प्रबंधन तथा फसल की आवश्यकतानुसार कृषि कार्यों को अपनाने की सलाह दी। किसानों को प्रेरित किया गया कि वे उन्नत किस्मों के बीजों का उपयोग करते हुए प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपने खेतों पर अपनाएं तथा इसके परिणामों के आधार पर अन्य किसानों को भी प्रेरित करें।कृषि को टिकाऊ एवं लाभकारी बनाने पर दिया गया जोरकार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. राजेंद्र सिंह नेगी ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन के वर्तमान दौर में ऐसी कृषि पद्धतियों को अपनाना आवश्यक है, जिनमें कम लागत में बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। उन्होंने कहा कि मिट्टी की उर्वरता, जल संरक्षण, जैव विविधता तथा फसल विविधीकरण पर विशेष ध्यान देकर खेती को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।कार्यक्रम में केंद्र के वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ श्री कमला शंकर शुक्ला तथा डॉ. उत्तम कुमार त्रिपाठी ने किसानों की कृषि संबंधी जिज्ञासाओं का समाधान किया तथा प्राकृतिक खेती की तकनीकों को व्यवहार में अपनाने के लिए प्रेरित किया।कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक खेती की वैज्ञानिक तकनीकों से परिचित कराना, मिट्टी के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना तथा रबी फसलों की उन्नत किस्मों के माध्यम से उत्पादन एवं कृषि की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना रहा।कार्यक्रम में उपस्थित कृषकों ने प्राकृतिक खेती की विभिन्न तकनीकों को सीखने में रुचि दिखाई तथा अपने खेतों में इन विधियों को अपनाने का संकल्प लिया

केपी नारायण स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय।







