🌸 मंजू अजय दुबे
-वर्तमान में संपूर्ण देश की शिक्षा व्यवस्था चरमरा सी गई है। शिक्षा के अलावा समाज की संपूर्ण जवबादारी शिक्षण संस्थाओं की हो कर रह गयी है। ये आलम पहले मात्र सरकारी स्कूलों का था ,अब तो निजी संस्थानों से भी वो सारे काम जबरदस्ती करवाये जा रहे हैं, जो पहले मात्र सरकारी स्कूलों द्वारा ही करवाए जा रहे थे। वो चाहे बच्चों के आधार कार्ड बनवाने का काम हो,चाहे जन्म प्रमाण पत्र,चाहे निवास प्रमाण पत्र। अब पालक का काम मात्र बच्चों को जन्म देना रह गया है। बाकी सारे काम विद्यालय द्वारा कराए जा रहे हैं। वो भी जबरदस्ती। विद्यालय के सारे स्टाफ बच्चों को पढ़ाने की बजाय इन्हीं कामों को पूर्ण करने एवं करवानें में लगे हुए हैं। जो विद्यालय इन कामों को समय पर पूर्ण कर रहा है वह सरकार एवं शिक्षा विभाग की दृष्टि से श्रेष्ठ विद्यालय है। बाकी विद्यालय बेकार हैं। वर्तमान में विद्यालयों की दुर्दशा को निम्नलिखित बिंदुओं से समझ सकते हैं -1. शिक्षक का समय शिक्षण से हट रहा है – शिक्षक का सबसे महत्वपूर्ण कार्य बच्चों को पढ़ाना, उनकी कठिनाइयों को समझना और उनके व्यक्तित्व का विकास करना है। लेकिन ऑनलाइन रिपोर्ट, पोर्टल पर डाटा भरना, फोटो/वीडियो अपलोड करना, विभिन्न सर्वे, नशामुक्ति अभियान , स्वच्छता अभियान और बार-बार मांगी जाने वाली विभिन्न सूचनाओं के कारण शिक्षकों का सारा समय इन प्रशासनिक कार्यों की खाना पूर्ति में ही चला जाता है। दुर्भाग्य की बात तो यह है, कि जो विद्यालय सूदूर ग्रामीण अंचल में संचालित हैं जहां किसी भी प्रकार के नेटवर्क की सुविधा उपलब्ध नहीं है,उनको भी काम पूर्ण करना है। ऐसे विद्यालय के शिक्षक अपने अपने वाहनों में बैठा कर बच्चों को नेटवर्क वाले शहरी इलाकों में अपने खर्च एवं अपने रिस्क पर लेकर आते हैं और आनलाइन कार्य पूर्ण करते हैं। अन्यथा उनका वेतन रोक दिया जाता है।2. विद्यालय “रिपोर्टिंग सेंटर” बनते जा रहे हैं – स्कूलों से प्रत्येक दिन लगातार प्रत्येक दिन अलग-अलग प्रकार की जानकारियां मांगी जाती है। इससे प्रधानाचार्य और शिक्षक ,शैक्षणिक योजना, कक्षा निरीक्षण, शिक्षक प्रशिक्षण और बच्चों की वास्तविक प्रगति पर ध्यान ही नहीं दे पा रहे हैं। वो मात्र सरकार एवं शिक्षा विभाग के रिपोर्टिंग सेंटर बन कर रह गए हैं।3. विद्यालय का उद्देश्य मात्र बच्चों का डाटा एकत्र करने का स्थान बन कर रह गया है – शिक्षा ऐसी हो जो बच्चे को केवल “जानकारी रखने वाला” नहीं, बल्कि सोचने वाला, समझने वाला, निर्णय लेने वाला, संवेदनशील और जिम्मेदार व्यक्ति बनाए। अपनी समाज, अपनी संस्कृति से अवगत कराये। अतः आज की आवश्यकता है, कि अनावश्यक रूप से विद्यालयों में ऑनलाइन रिपोर्टिंग और डाटा एंट्री को कम किया जाए। एक ही जानकारी बार-बार साल भर अलग-अलग पोर्टल पर न मांगी जाए। बल्कि शिक्षक का अधिकतम समय कक्षा और बच्चों के लिए सुरक्षित किया जाए। अन्यथा शिक्षा व्यवस्था समाज को किस ओर ले जायेगी यह समझ से परे है।
(लेखिका शिक्षाविद और राष्ट्र सेविका समिति की प्रांतीय पदाधिकारी है )


केपी नारायण स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय।


