धान के खेत में छिपकर बचाया खुद को इस्लामिया कमेटी’ के लिखित पंचनामे और सरपंच के बयान के बाद भी मूकदर्शक बनी लौर पुलिस
जागरण टाइम्स,मऊगंज एमपी 25अक्टूबर। मऊगंज मध्य प्रदेश के नवगठित मऊगंज जिले का लौर थाना क्षेत्र स्थित ग्राम सीतापुर इन दिनों अपराधियों के हौसले और खाकी की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। पश्चिम बंगाल (कोलकाता) की निवासी और दलित समाज से आने वाली पीड़ित बेटी सबिता साकेत के साथ हुई अमानवीय प्रताड़ना, छल-कपट और डकैती के सनसनीखेज मामले ने पूरे मध्यप्रदेश की कानून-व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। हैदराबाद में बिस्किट कंपनी में काम के दौरान प्रेमजाल में फंसाकर मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह रचाने और 8 साल तक पति-पत्नी की तरह रखने के बाद आरोपी ताज अली अंसारी (पिता रहीमुद्दीन अंसारी, निवासी सीतापुर) अपनी मां मोमिना बेगम के साथ मिलकर पीड़िता के 50,000 रुपये नकद, 1 सोने का झुमका, 6 पेयर पायल, अंगूठी और सोने का मंगलसूत्र लूटकर रातों-रात सीतापुर फरार हो गया। सबसे चौंकाने वाली और शर्मनाक सच्चाई यह है कि सीतापुर के इसी बदनाम घर और परिवार का ‘लव जिहाद’ व षड्यंत्रों का यह कोई पहला मामला नहीं है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, इसके पूर्व भी इसी घर से ऐसा ही गंभीर मामला सामने आया था, जिसमें पुलिसकर्मियों की भूमिका संदिग्ध मिलने पर उन पर गाज गिरी थी और वे निलंबित हुए थे। बावजूद इसके, उसी घर से दोबारा ऐसा ही घिनौना कृत्य होना यह साबित करता है कि इन अपराधियों को न तो कानून का डर है और न ही पुलिस का। घटना की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पीड़िता तड़पती हुई सीतापुर गांव पहुंची, तो ग्राम सरपंच मोहम्मद शब्बीर अंसारी ने भी पूरे मामले की सत्यता पर शत-प्रतिशत मुहर लगाई। सरपंच ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि पंचायत स्तर पर आरोपी पक्ष को काफी समझाया गया, लेकिन वे अपनी जिद्द पर अड़े रहे। हद तो तब हो गई जब आरोपी पक्ष के लोगों ने खुलेआम यह गीदड़ भभकी दी कि हम अपनी जमीन बेचकर पुलिस और प्रशासन को खरीद लेंगे, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता!”* इस पूरे काले कारनामे की सबसे पक्की और ऑन-रिकॉर्ड गवाही ‘इस्लामिया कमेटी सीतापुर’ के आधिकारिक पंचनामे/पत्र (दिनांक 07/10/2026) से मिलती है। कमेटी की विशेष बैठक में सार्वजनिक रूप से यह बात रखी गई कि ताज अली अंसारी ने हैदराबाद में हिंदू लड़की से 8 साल पहले मंदिर में विवाह किया था, जिसके वीडियो साक्ष्य भी मौजूद हैं। कमेटी ने लिखित फैसला सुनाया कि जब तक दोनों शरीयत के दायरे में फैसला नहीं करते, तब तक रहीमुद्दीन अंसारी के पूरे परिवार को समाज से सामाजिक बहिष्कृत किया जाता है। इस ऐतिहासिक पंचनामे पर कमेटी के हाफिज मो० फरीद उल हक, इमलाम मो०, रोशन हुसैन, जिबरील अंसारी, अहमद अंसारी, अब्दुल लफीज (बाबूलाल), नितिलेश गुप्ता, हकीम, उमरफारूक , चांद अली अंसारी, नूर अहमद, अतीक अहमद, अख्तर रजा अंसारी, सलामुद्दीन अंसारी (पटवारी), हुरुम मो०, नासिक अली, हारून मोहम्मद अंसारी, रहीम हुसैन, अश्फारक हक, मुस्तक अंसारी, ताहिर मो०, मो० तौफीक, मो० रहीस, बाबू सलाम उस्मानी और दिलशाद अंसारी जैसे दर्जनों गणमान्य लोगों के हस्ताक्षर मौजूद हैं। पंचनामे के नोट में यह भी दर्ज है कि फैसला सुनाने के दौरान आरोपी के घर की महिलाओं ने कमेटी के सदस्यों को गंदी-गंदी गालियां दीं और चप्पल मारने की बात कही। कमेटी के फैसले के बाद जब पीड़िता को कमरे में बंद कर उसके पैर घसीटे गए, मुंह में कपड़ा ठूंसा गया और सास मोमिना बेगम द्वारा खौलता कड़वा तेल डालकर जान से मारने की धमकी दी गई, तो किसी तरह जान बचाकर भागी पीड़िता के *मोबाइल, आधार कार्ड, शादी का एल्बम व कागजात लाइटर से जलाकर राख कर दिए गए*। पीड़िता ने रातभर धान के खेतों में छिपकर अपनी जान बचाई। लेकिन जब यह प्रताड़ित महिला न्याय की आस में लौर थाने पहुंची, तो थाना प्रभारी रीना सिंह का रवैया बेहद क्रूर और असंवेदनशील रहा। थाना प्रभारी ने एफआईआर दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया और पीड़िता को दुत्कार कर थाने से भगा दिया। मजबूर होकर दूसरे प्रदेश से आई यह बेसहारा बेटी सुबह से लेकर शाम तक मऊगंज पुलिस अधीक्षक कार्यालय के चक्कर काटती रही और अपनी जिंदगी की भीख मांगती रही। सवाल यह उठता है कि दो-दो विधायकों वाले मऊगंज जिले में, जहां मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है, वहां एक दलित महिला के साथ इतनी बर्बरता होने के बावजूद क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की जुबान क्यों बंद है? चुनाव के समय दलितों और शोषितों के मसीहा बनने वाले बहुजन समाज के नेताओं ने भी आज तक इस पीड़िता के हक में एक शब्द नहीं बोला है। जब पंचायत से लेकर ‘इस्लामिया कमेटी’ तक के लिखित दस्तावेज चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं, तो लौर पुलिस किस दबाव या मूक सहमति के तहत मुख्य आरोपियों पर एफआईआर दर्ज करने से बच रही है?

केपी नारायण स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय।



