भगवान विष्णु की आराधना से पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति की मान्यता |
द जागरण टाइम्स डेस्क 21अक्टूबर । आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का व्रत गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है। यह तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पापांकुशा एकादशी का व्रत करने और विधि-विधान से भगवान श्रीहरि की पूजा-अर्चना करने से साधक को पुण्य फल प्राप्त होता है। साथ ही पितरों की सद्गति और मोक्ष की प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत किया जाता है।
डॉ. नागेंद्र नारायण शर्मा के अनुसार , एकादशी तिथि का आरंभ बुधवार, 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर होगा। इसका समापन गुरुवार, 22 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 47 मिनट पर होगा। उदया तिथि की मान्यता के अनुसार, पापांकुशा एकादशी का व्रत 22 अक्टूबर को रखा जाएगा।## पापांकुशा एकादशी व्रत और पारण का शुभ समयपंचांग के अनुसार, पापांकुशा एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालु निर्धारित समय पर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर सकते हैं। व्रत का पारण द्वादशी तिथि में करना महत्वपूर्ण माना जाता है।-
एकादशी तिथि प्रारंभ: 21 अक्टूबर 2026, बुधवार, दोपहर 2:11 बजे।- एकादशी तिथि समाप्त: 22 अक्टूबर 2026, गुरुवार, दोपहर 2:47 बजे।- व्रत की तिथि: 22 अक्टूबर 2026, गुरुवार।- व्रत पारण का समय: 23 अक्टूबर 2026, शुक्रवार, सुबह 6:27 से 8:42 बजे तक। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र-जप, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। श्रद्धालु अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत का पालन करते हैं।
पापांकुशा एकादशी की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय विंध्याचल पर्वत पर क्रोधना नाम का एक अत्यंत क्रूर शिकारी रहता था। वह जीवनभर पशु-पक्षियों का शिकार करता रहा और अनेक पाप कर्मों में लिप्त रहा। जब उसके जीवन का अंतिम समय निकट आया, तो उसे मृत्यु और अपने कर्मों के परिणाम का भय सताने लगा।अपने पापों से मुक्ति का उपाय जानने के लिए वह महर्षि अंगिरा के पास पहुंचा। उसने ऋषि से कहा कि उसने जीवनभर पाप कर्म किए हैं और अब उसे नरक जाने का भय सता रहा है। उसने महर्षि से ऐसा उपाय बताने की प्रार्थना की, जिससे उसके पापों का नाश हो सके और उसे मोक्ष की प्राप्ति हो।तब महर्षि अंगिरा ने उसे पापांकुशा एकादशी के व्रत का महत्व बताया और भगवान विष्णु की आराधना करने की सलाह दी। ऋषि के निर्देशानुसार क्रोधना ने विधि-विधान से व्रत रखा और भगवान श्रीहरि का स्मरण किया। धार्मिक कथा के अनुसार, व्रत के प्रभाव से उसे पापों से मुक्ति मिली और अंततः बैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई।यह कथा संदेश देती है कि मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए और सदाचार, भक्ति तथा परोपकार के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। एकादशी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान
1. दशमी तिथि से खानपान में रखें संयम: धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही शुरू कर देनी चाहिए। इस दौरान चावल और तामसिक भोजन से परहेज करने की परंपरा है।
2. सात प्रकार के अनाज से दूरी: परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, दशमी और एकादशी के दौरान गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर की दाल का सेवन नहीं किया जाता। व्रत के नियमों का पालन अपनी पारिवारिक और धार्मिक परंपरा के अनुसार किया जा सकता है।**
3. क्रोध और कटु वाणी से बचें:** एकादशी के दिन क्रोध, अहंकार, झूठ, छल-कपट और विवाद से दूर रहने की सलाह दी जाती है। इस दिन मन को शांत रखकर भगवान विष्णु का स्मरण करना शुभ माना जाता है।*
. दान-पुण्य का विशेष महत्व:** धार्मिक मान्यता के अनुसार, पापांकुशा एकादशी पर सोना, तिल, गाय, अन्न और जल का दान करना पुण्यकारी माना जाता है। जरूरतमंदों की सहायता करना भी शुभ कार्यों में शामिल है।**5. भजन-कीर्तन और पूजा करें:** श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना, मंत्र-जप, धार्मिक ग्रंथों के पाठ और भजन-कीर्तन के माध्यम से दिन व्यतीत करते हैं।
श्रद्धा और संयम के साथ करें व्रतपापांकुशा एकादशी केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे आत्मसंयम, सदाचार और ईश्वर के प्रति समर्पण का पर्व भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की आराधना, जरूरतमंदों की सहायता और मन-वचन-कर्म की शुद्धता का विशेष महत्व है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहकर भक्ति तथा सद्कर्मों पर ध्यान देना चाहिए।

केपी नारायण स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय।



