–जन्मभूमि आन्दोलन की ही देन है देश में विचारों की सरकार
द जागरण टाइम्स, अयोध्या, 30 सितंबर। कारसेवक पुरम में चल रहे अशोक सिंहल फाउण्डेशन शिविर के चौथे दिन अयोध्या धाम के कई संत महंतों ने शिविर का निरीक्षण कर सेवा कार्य को समझा, सराहा। इस अवसर पर हनुमान टेकरी से स्वामी वरुण दास जी महाराज ने कहा कि अशोक सिंघल जी वह व्यक्ति थे जिन्होंने सनातन अनुयायी सभी संत महापुरुषों को एक साथ एक मंच पर लाकर, एक सूत्र में पिरोया। वह एक सूत्र में नहीं पिरोते तो शायद श्रीराम जन्मभूमि पर जिस प्रकार आज भव्य मंदिर दिखाई दे रहा है वह न हो पाता। भारत की गद्दी पर जिस प्रकार हिंदुओं का मान बढ़ाने वाली दक्षिणपंथी सरकार है, वह कभी संभव नहीं थी। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की ही यह देन है कि भारतीय सत्ता पर हमारे विचारों के लोग आ सके।उन्होंने कहा कि कम समय में बड़े कार्य को संपादित करना, यह महापुरुषों द्वारा ही संभव है।

500 वर्षों के हिन्दू के माथे पर लगे उस कलंक को मिटाने के लिए चार लाख से ज्यादा लोगों ने अपने प्राणों की आहुतियां दीं, 76 युद्ध हुए। अयोध्या की भूमि जो इसलिए जानी जाती थी कि यहां युद्ध नहीं हो सकता और यदि हुआ तो कोई आक्रमणकारी जीत नहीं सकता है। पूरे विश्व के इतिहास में अगर देखा जाए तो इतना लंबा संघर्ष और इतनी लंबी युद्ध की कोई परंपरा सुनने में नहीं आती, जो श्रीराम जन्मभूमि की रही। भारत के स्वतंत्रता के अवसर पर हमारे पूज्य दादा गुरु ने कहा कि अब भारत स्वतंत्र हो गया तो हिंदुओं के ऊपर लगा हुआ कलंक भी मिटना चाहिए। 22-23 दिसंबर की आधी रात को श्रीराम जन्मभूमि पर श्रीराम लला को प्रकट किया।

इस परंपरा का सम्मान करते हुए पूज्य परमहंस जी महाराज ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और पूज्य महाराज श्री वेदांती जी ने पूरे देश में अलख जगाई। इसी बीच में गुरु गोलवलकर जी का जो चिंतन था कि हिंदू कैसे इकट्ठा हों, 1964 में सांदीपनि आश्रम मुंबई में महीनों चिंतन के बाद स्वामी चिन्मयानंद जी ने गायकवाड जी को साथ लेकर विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की। परिषद स्थापना की सार्थकता तब हुई जब विज्ञान भवन दिल्ली में यह अलख जगाई गई कि विश्व हिंदू परिषद ही राम जन्मभूमि आंदोलन को अपने हाथ ले। अयोध्या आकर पूज्य अशोक सिंघल, दाऊदयाल खन्ना, पूज्य परमहंस जी, पूज्य गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ सब लोगों ने साथ विचार किया और अयोध्या से देशव्यापी आंदोलन शुरू हुआ। शैव-वैष्णव, जैन, बौद्ध, कबीरपंथी, नानक पंथी, दादू पंथी, स्वामीनारायण सब बंटे थे, जिसे देखो सब अपनी धुन बजा रहा था। अशोक सिंघल जी वह व्यक्ति थे जिन्होंने सारे लोगों को एक साथ एक मंच पर लाकर, एक सूत्र में पिरोया। वह एक सूत्र में नहीं पिरोते तो शायद राम जन्मभूमि पर जिस प्रकार आज भव्य मंदिर दिखाई दे रहा है भारत की गद्दी पर जिस प्रकार हिंदुओं का मान बढ़ाने वाली दक्षिणपंथी सरकार दिखाई दे रही है, वह कभी संभव नहीं था। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की ही यह देन है कि भारतीय सत्ता पर हमारे विचार के लोग आ सके। अशोक सिंघल जी जो दैनिक वैदिक कर्मकांड को भी संभव करते हुए नित्य राष्ट्र के प्रति चिंतन करते और संपूर्ण देश का विचार कर संतो को मठ मंदिरों से निकाल कर गांव तक ले गए। हम लोग गांव में आदिवासी, वनवासी, गिरिवासियों के बीच जाते रहे, उनके यहां भोजन कर उनके साथ बैठ सत्संग करते। एकल विद्यालय की परिकल्पना हुई, नेपाल के तमाम तराई क्षेत्रों में एकल विद्यालय संचालित हो रहे हैं। पूज्य परमहंस जी महाराज के साथ मिलकर सबसे पिछड़े को आगे कैसे ला सकते हैं और ईसाई मिशनरियां जहां प्रचार कर रही हैं वहां हम कैसे जा सकते हैं। इसका दिगंबर अखाड़ा में चिंतन करके हरि कथा सत्संग समिति की स्थापना की गई। इस तरह के प्रकल्प जिसका लक्ष्य एक ही था कि भारत के वैभव को कैसे बढ़ाना है और श्रीराम जन्मभूमि, श्रीकृष्ण जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ सहित हिंदुओं के माथे पर लगे कलंक को मिटाना ही था। यह कोई कर सकता था तो अशोक सिंघल ही कर सकते थे। ऐसे व्यक्तित्व जन्म नहीं लेते अवतरित होते हैं। यहां आकर अपना कार्य करके उसी भांति चले जाते हैं। “…जैसी मिली थी हमको चदरिया, जस के तस रख दीनी…”। अशोक जी के साथ हम लोगों के अनेक संस्मरण हैं। महापुरुषों की बात कैसी होती है एक उदाहरण दूंगा। एक विदेशी ट्रस्ट जो हिंदुओं को उनके महापुरुषों को बदनाम करने के लिए 100 करोड रुपए फंडिंग करता है, इस षड्यंत्र के शिकार हमारे पूज्य कांची कामकोटि के शंकराचार्य जी हो गए। जिस समय पूरा देश दीपावली मना रहा था उस समय भारत की सत्ता पर कांग्रेस का शासन था। जय ललिता ने तमिलनाडु के बॉर्डर पर उन्हें दीपावाली की आधी रात को गिरफ्तार कर लिया। देश के अंदर आंदोलन हुए। माननीय अटल बिहारी वाजपेई, आडवाणी जी, वेंकटरमन पूज्य संतों के साथ बैठकर दिल्ली में धरना प्रदर्शन, आंदोलन हुआ। उसके बाद उन्हें छोड़ा गया। अशोक सिंघल जी के साथ हम लोग तिरुपति बालाजी में बैठे थे। अशोक जी ने कहा महाराज श्री आपको बड़ा कष्ट हुआ, लेकिन शंकराचार्य जी ने जो अशोक सिंघल जी से कहा वह अति महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा मैने जेल यात्रा की चलो कोई बात नहीं, इसी बहाने सारे महापुरुष एक साथ आए तो। जो अपने कष्ट में भी देश हित की बात सोचता है वही महापुरुष है। ऐसे ही महापुरुषों के जीवन के संदेश लेकर हमें आगे बढ़ने का प्रेरणा मिलती है।ऐसे महापुरुष की स्मृति में चल रहा कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण शिविर निःसंदेश सराहनीय है जो किसी भी घटना अथवा कारणों से पीड़ित लोगों के चहरे पर मुस्कान ला रहा है। इस अवसर पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के न्यासी दिनेन्द्र दास जी महाराज, विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षक दिनेश चंद्र, हनुमानगढ़ी के दिवेशाचार्य जी महाराज, अड़गड़ा मंदिर सीताराम कुंज के सत्येंद्र दास जी महाराज, श्री महंत महेशदास जी महाराज, सीताकांत सदन के ब्रह्मचारी रामानुज दास जी, विश्वकर्मा मंदिर के महेश दास जी महाराज, विकलांग जनकल्याण विभाग अयोध्या मंडल की उपनिदेशक विनीता यादव, जिला विकलांग कल्याण अधिकारी चन्द्रेश त्रिपाठी आदि ने शिविर का निरीक्षण कर आशीर्वाद दिया। इस अवसर पर फाउण्डेशन के समन्यवयक मनोज तिवारी, शिखर आदि ने सभी संतों को अंग निर्माण कार्यशाला, नेत्र परीक्षण व अन्य गतिविधियां दिखाईं तथा मंच पर अंग वस्त्र, पटका, श्रीराम परिवार का में चित्र व अशोक सिंघल जी पर लिखी पुस्तक भेंट कर सम्मान किया। अशोक सिंहल फाउण्डेशन द्वारा आयोजित निःशुल्क अंग प्रत्यारोपण शिविर के चौथे दिन 35 लाभार्थियों को कृत्रिम अंग व आवश्यक उपकरण दिए गए। कुल 114 लोगों को चश्में वितरित किए गए। चौथे दिन शिविर में 29 को कृत्रिम अंग, 6 को हाथ का वितरण किया गया। 118 लोगों का नेत्र परीक्षण कर 114 को चश्मे वितरित किए गए।

केपी नारायण स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय।



