
द जागरण टाइम्स। अयोध्या, 28 सितंबर। श्रद्धेय अशोक सिंहल की जन्म जयंती पर कारसेवकपुरम् में अशोक सिंहल फाउण्डेशन द्वारा आयोजित निःशुल्क कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण शिविर के दूसरे दिन बावन जी मंदिर के महंत सहित अन्य संतों ने शिविर का निरीक्षण कर खुशी व्यक्त करते हुए आयोजकों को आशीर्वचन दिया। बावन जी मंदिर के महंत बैदेही वल्लभशरण महाराज, बधाई भवन के महंत राजीव लोचन की महाराज, मौनी जी महाराज किशोरी शरण जी व सीताकांत सदन के ब्रह्मचारी रामानुजाचार्य जी महाराज ने बारी बारी से शिविर का निरीक्षण किया और कृत्रिम अंग निर्माण के साथ उन्हें लगाने की प्रक्रिया का अवलोकन किया। संतो ने इसे दिव्यांगजनों की ठोस सेवा करार देते हुए आयोजकों को आशीर्वाद दिया।

इस अवसर पर वेद विद्यालय के आचार्यों प्रधानाचार्य इंद्रदेव मिश्र, आचार्य नारद भट्टरई, आचार्य ऋषभदेव ने सभी संतों को अंगवस्त्र, राम परिवार चित्र व पुस्तक देकर सम्मानित किया।
एक साथ पैर गंवाने वाली मां-बेटी को मिली नई उम्मीद
निःशुल्क कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण शिविर के दूसरे दिन सड़क हादसे में एक साथ पैर गंवाने वाली मां-बेटी को उम्मीद की नई रोशनी मिली। रायबरेली निवासी अशोक कुमार के अनुसार उनकी बहन सुरेखा मां शकुंतला को स्कूटी पर बैठा कर बड़ी बहन के विवाह का आमंत्रण पत्र देने ननिहाल जा रही थी। घर से निकलकर कुछ दूर जाने के बाद एक तेज रफ्तार अनियंत्रित ट्रक दोनों को कुचलते निकल गया। पुलिस ने जनता की मदद से दोनों को अस्पताल में भर्ती कराकर परिवारीजनों को सूचना दी। होश आने पर मां बेटी दोनों ने अपने दाहिने पैर को कुचला हुआ पाया। वहां से जीवन में निराशा का अंधेरा नजर आने लगा। इस हादसे के चलते बहन का विवाह भी टल गया और एक वर्ष बाद दोबारा तिथि निर्धारित की गई। खेती किसानी के बल पर जीवन यापन करने वाले परिवार के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया। दो वर्ष पहले किसी ने कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण शिविर की जानकारी दी तो यहां कृत्रिम पैर लगाए गए।

सुरेखा की मानें तो वह अब आराम से चल फिर कर अपने सभी काम करती है। खुद को किसी से कम नहीं समझती।

शकुंतला भी खेत पर जाकर काम में परिवार का हाथ बंटाने लगी है। शिविर के दूसरे दिन दोनों ने अपने पैरों की दोबारा जांच कराई और दो वर्षों में आई कुछ गड़बड़ी को दूर कराया। पूरा काम होने पर दोनों को उम्मीद की नई रोशनी दिखाई पड़ी।
ट्रेन से हुई घटना ने छीने सपने, नए अंग से होगी उड़ान

बचपन से पुलिस विभाग में भर्ती होकर सेवा देने का सपना उस समय चूर चूर हो गया जब ट्रेन से उतरते समय ममता ने संतुलन खोया। शरीर के बिगड़े संतुलन ने मानों पूरे जीवन का संतुलन की बिगाड़ दिया हो। अब कृत्रिम अंग पाकर एक बार फिर पुलिस अथवा सरकारी सेवा में आने का जज्बा हिलोरें मारने लगा है। मूल रूप से इटावा निवासी ममता ने बचपन से ही पुलिस विभाग में भर्ती होकर सेवा देने का सपना देखा था। बी.एससी करने के बाद उसने परीक्षा की तैयारी की और दिल्ली पुलिस में जगह निकलने पर फार्म भर दिया। भर्ती परीक्ष देने के लिए जाते समय दिल्ली निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर धमी गति से चल रही ट्रेन की बोगी से उतरते समय शरीर का संतुलन बिगड़ गया। घटना में बांया पैर प्लेटफार्म और ट्रेन के बीच खाली जगह में जा फंसा। जब तक ट्रेन पूरी तरह रुकती तब तक जीवन का ही संतुलन बिगड़ चुका था। डॉक्टरों ने घुटने से नीचे पैर काटा पर कुछ दिन बाद गैंग्रीन होने की वजह से घुटने से ऊपर जांघ के नीचे से काटना पड़ा। ममता के पति लेकेंद्र के अनुसार पत्नी हादसे के बाद अवसाद ग्रस्त होने लगी और उसे जीवन में अंधेरा ही नजर आने लगा। लोकनायक जयप्रकाश हॉस्पिटल से ही जयपुर फुट और वहां से इस शिविर की जानकारी हुई। शिविर के दूसरे दिन अंग प्रत्यारोपण होने के बाद पुनः मन में नई ऊर्जा का संचार हुआ और पुलिस विभाग के कार्यालयों अथवा किसी अन्य सरकारी विभाग में सेवा करने के प्रयास का साहस मिला।
अंग प्रत्यारोपण ने दिया परिवार के साथ खुशी बांटने का उत्साह

गुजरात से मुम्बई जाते समय सैंडिल में साड़ी क्या उलझी मानों जिन्दगी की डोर ही उलझ गई हो। रेलवे प्लेटफार्म पर गिरते ही दाहिना पैर ट्रेन के पहिए की चपेट में आ गया। उस समय ऐसा लगा जैसे जिन्दगी में सब कुछ मिट गया हो। कृत्रिम अंग ने जीवन जीने का उत्साह प्रदान किया और आज एक सामान्य महिला की तरह बच्चों और परिवार के साथ खुशी से जीवन निर्वाह हो रहा है। अयोध्या के ही गोसाईगंज निवासी संध्या उस दिन को याद कर सिहर उठती है जब वह मायके के परिवार के साथ रिश्तेदार के यहां सूरत से मुम्बई जा रही थी। लगभग 16 साल पहले 2010 में स्टेशन पर ट्रेन से उतरते समय सैंडिल में साड़ी उलझ गई। जब तक उलझन छूटती शरीर असंतुलित हुआ और दाहिना पैर पटरी पर आने से ट्रेन के पहिए के नीचे आया और पैर का पंजा कट गया। कुछ दिन बाद चोट ठीक होने बजाए समस्या बढ़ी तो डाक्टरों ने जीवन बचाने के लिए घुटने के नीचे से पैर काट दिया। बकौल संध्या मन में तरह तरह के विचार उठने लगे, बच्चों को गोद ले पाऊंगी, उनके साथ खेल पाऊंगी या नहीं। कुछ दिन बाद अंग प्रत्यारोपण हुआ तो सब कुछ सामान्य लगने लगा। तीन साल पहले यहां नया प्रत्यारोपण कराया। कुछ असुविधा होने पर अब हर साल शिविर में कमी दुरुस्त कराने की सहूलियत मिल गई है और जीवन में खुशी का संचार महसूस होने लगा है।

केपी नारायण स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय।



