अरविंद शर्मा ने दर्द साझा किया, सवाल उठाए
द जागरण टाइम्स, डेस्क 12अक्टूबर। स्वर्गवासी अथवा अन्य स्थान पर शिफ्ट हो चुके काफी वोटर के नाम भारत की मतदाता सूची से काट दिए गए। स्पेशल इंसेंटिव रिवीजन के अंतर्गत इस काम को किया गया। इसे लेकर हो हल्ले के बीच बिहार के गया जिले से एक बहुत शानदार मामला सामने आया। बिहार के गया जिले से वास्ता रखने वाले अरविंद शर्मा की बहुत ही रोचक कहानी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कैलाशजी ने शेयर किया।
उन्हीं के शब्दों में लिखा गया _ ज्ञानेश ने मेरी स्वर्गीय नानी का वोट काटा, उन्हें जाना ही होगा। उन्होंने मेरी स्वर्गीय नानी का वोट काट दिया। नानी का निधन 1995 में हो गया था, लेकिन अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तेमाल में वह किसी से पीछे नहीं थीं। मरने के बाद भी लगातार 31 वर्षों से वोट करती आ रही थीं, मगर ज्ञानेश ने उनका वोट काट दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने मेरे साथ भी अन्याय किया। मेरे पास दो वोटों का अधिकार था, उसे काटकर एक कर दिया। आप ही बताइए यह कितना बड़ा अन्याय है?मेरी नानी का नाम बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से पहले तक दर्ज था। यानी दुनिया से विदा होने के तीन दशक बाद भी लोकतंत्र के महापर्व में उनकी भागीदारी सुनिश्चित थी। नानी के साथ-साथ उनका नाती अरविंद शर्मा भी दो जगहों पर मतदाता बना हुआ था। ज्ञानेश कुमार ने एक जगह से मेरा नाम हटाकर मेरे लोकतांत्रिक अधिकारों में कटौती कर दी। अब बताइए, ऐसे में उनके इस्तीफे की मांग करना अनुचित कैसे है?कुछ लोगों को यह झूठ लग सकता है, लेकिन मैं प्रमाण सार्वजनिक कर रहा हूं। गया जिले के टिकारी थाने का हसनपुर मेरा ननिहाल है। बचपन वहीं बीता। नाना के कोई बेटा नहीं था। इसलिए मां-पिता समेत हम सभी भाई-बहनों का दूसरा घर हसनपुर ही था। वहां की मतदाता सूची में सबके नाम भी दर्ज थे। उधर, दादाजी की इच्छा थी कि हम अपने पैतृक गांव ऊर विशुनपुर में ही रहें। लिहाजा वहां भी हम सबके वोट बनवा दिए गए। इस तरह मेरे परिवार के सभी सदस्यों को दो-दो जगह मतदाता बने रहने का सौभाग्य प्राप्त हो गया। कोई भी पता कर सकता है कि एसआईआर से पहले मेरी स्वर्गीय नानी समेत मेरे पूरे परिवार का हसनपुर में वोट था या नहीं।मैं नौकरी के सिलसिले में रांची, लखनऊ, मेरठ, पटना और दिल्ली जैसे शहरों में भी रहा, लेकिन वहां वोट नहीं बनवाया। बनवा लेता तो लोकतंत्र में मेरी हिस्सेदारी तीन-चार जगहों तक फैल सकती थी। हालांकि, गांव में वोट डालने भी नहीं जाता था। वर्ष 2000 के बाद पूरा परिवार पैतृक गांव में शिफ्ट हो गया। नानी के निधन के बाद हसनपुर से संपर्क भी टूट गया, लेकिन मतदाता सूची में नाम कायम रहे। नानी का भी और परिवार के बाकी सदस्यों का भी।ज्ञानेश कुमार बताएं कि उन्होंने मेरी स्वर्गीय नानी को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने की हिम्मत कैसे की? पहले के चुनाव आयुक्तों ने इतने वर्षों तक नानी के नाम को मतदाता सूची में बनाए रखा था। ज्ञानेश कुमार, वोट सुधार के नाम पर मेरे जैसे लोगों की दोहरी मतदाता सदस्यता भी छीन लेंगे तो फिर लोकतंत्र में हमारी अतिरिक्त भागीदारी का क्या मतलब रह जाएगा? एक व्यक्ति, एक वोट का सिद्धांत अपनी जगह, लेकिन मेरे दो वोटों का पुराना गौरव भी तो कुछ था!

केपी नारायण स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित। दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय।



